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वे बूढ़े

वे बूढ़े..
तब से करते हैं...लड़ाई,
अपने आप से..जब वे पैदा करते हैं
अपने बच्चे..
करते हैं जीवन संघर्ष..
काम...कड़ी मेहनत,
झेलते हैं..सहते है..तमाम क्लेश, क्लांति..
कभी करते क्रोध,
तो कभी समझाते शांति..
पर...
आदर्शों के साथ जीना..
और देना अच्छे संस्कार...
रहता है सदा उनका लक्ष्य।
और फिर बीतता है समय...
जब वे दोनों,
अपने दोनों की बगिया को सींचते हैं,
लगाते हैं अपना समय..
अपना सारा मन..सारा धन
अपने बच्चों पर..
उनका ये निवेश...
उनका कर्तव्य ही तो है..
जी तोड़ मेहनत से-
अपने सभी तंतुओं को बटोरकर
एक-एक पाई जोड़कर
वे खड़ा करते हैं,
उनके लिए आधार..
जो जीवन की आँधी में हिले नहीं,
देते है घनी छाया-
बचाए जो धूप के थपेड़ों से से..
पर ये निवेश भी डूब जाता है,
सट्टा बाजार की तरह..
जब..उनके दोनों.. इन दोनों को
जमा कर देते हैं किसी वृद्ध घर में
और सिखाते हैं औकात,
बताते हैं गलतियाँ उनके जीवन की।
और तब... लगता है उन्हें..
जैसे यह पिछले जनम का
कुछ चक्कर तो जरूर है..
पर..
यही तो शाश्वत सत्य है,
औलाद तो हमेशा से ऐसी ही रही है भाई,
जिसने मरने के बाद भी नहीं छोड़ा..
उनकी मिट्टी में भी आग लगाई।

©mukesh_nagar

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही मर्मस्पर्शी सृजन आदरणीय मुकेश जी |!!! बुजुर्ग अपने कर्तव्य निर्वहन के बाद अपने आप से संवाद में जीवन भर का लेखा जोखा करते रहते हैं | बुजुर्गों पर रचनाएँ देख वहीं ठिठक जाती हूँ | इसका कारण शायद ये रहा मुझे बाबा - दादी का सानिध्य बहुत ज्यादा मिला है बचपन में | मेरा सौभाग्य शादी के बाद मैं ने सास - ससुर का स्नेहिल सानिध्य पाया है | | बड़ों का का चिंतन और सीख हमेशा बेजोड़ होते है |रही औलाद की बात - हर नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से कम संवेदनशील होती है | जल्द ही आपकी अन्य रचनाएँ पढने जरुर आऊंगी प्रतिलिपि से लिंक ले आपके ब्लॉग पर आई|सादर

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