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तीन गुण

तीन गुण
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जीवन के तीन गुण
सफलता
सम्पन्नता
और अवस्था
अपनी तरफ खींचती है।
मित्रों को..
विरोधियों को भी...
सदा से ।
सभी बन जाते हैं मित्र।
छलकने लगता है प्रेम।
पर...
यह 'पर' बड़ा
गहरा सूचक है।
जैसे ही यह तीनों
ढलान पर
क्षीण होते है,
साफ दिखने लगता है सबका..
... प्रेम।
क्योंकि...
उनमें से कुछ
प्रेम करते हैं...
हृदय से,
कुछ देह से,
और कुछ...
बुद्धि से।
एक निष्काम, रहेगा सर्वदा।
दूसरा सकाम...
चला जाएगा,
और...
तीसरा,
जो प्रेम की आड़ में है,
पूर्ण विलोम।
रे...बचना इसी से है...
रहना है..
सा व धा न।

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मेरा दिन

भीषण तपती गर्मी एक मई की दुपहरी वह बहुत खुश है, आज उसकी बेटी को खाना मिलेगा। बेटी कहती है.. गर्मी गंदी है बापू स्कूल की छुट्टी तो मिड डे मील भी बन्द ? पर.. आज फिर उसे काम मिला है, सेठ की तीसरी मंजिल उसकी रोटी है, निचली मंजिल के एसी पंखे से आती गर्म हवा.. सर से ईंटों का गट्ठर उतारते समय उसका पसीना सुखाती हैं..। नमक और सत्तू है, उसका ग्लूकोज़.. जो देता है उसे शक्ति अगले दिन काम ढूँढने की सुना है! आज उसका दिन है.. मजदूर दिवस..। दिनभर सोकर थके नेता शाम उठा लेंगे झंडे, जुटाएँगे लोग.. लगाएँगे नारे, मशाल और पोस्टर ले, सभा करेंगे, लगाएँगे भोग.. फिर प्रस्थान करेंगे, अपने-अपने घर को.. वह कहता है- मैं संध्या को खतम करूँगा आज का काम.. पीऊँगा..ठंडा पानी जो अभी तक मुफ्त है.. थोड़ा सा आटा ले.. जाऊँगा अपनी झोपड़, बेटी को खिलाऊँगा.. अपने हाथों, देखूँगा उसके चेहरे की हँसी और खुशी से मनाऊँगा.. अपना दिन..। मेरा दिन है आज, मजदूर दिवस।

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वे बूढ़े.. तब से करते हैं...लड़ाई, अपने आप से..जब वे पैदा करते हैं अपने बच्चे.. करते हैं जीवन संघर्ष.. काम...कड़ी मेहनत, झेलते हैं..सहते है..तमाम क्लेश, क्लांति.. कभी करते क्रोध, तो कभी समझाते शांति.. पर... आदर्शों के साथ जीना.. और देना अच्छे संस्कार... रहता है सदा उनका लक्ष्य। और फिर बीतता है समय... जब वे दोनों, अपने दोनों की बगिया को सींचते हैं, लगाते हैं अपना समय.. अपना सारा मन..सारा धन अपने बच्चों पर.. उनका ये निवेश... उनका कर्तव्य ही तो है.. जी तोड़ मेहनत से- अपने सभी तंतुओं को बटोरकर एक-एक पाई जोड़कर वे खड़ा करते हैं, उनके लिए आधार.. जो जीवन की आँधी में हिले नहीं, देते है घनी छाया- बचाए जो धूप के थपेड़ों से से.. पर ये निवेश भी डूब जाता है, सट्टा बाजार की तरह.. जब..उनके दोनों.. इन दोनों को जमा कर देते हैं किसी वृद्ध घर में और सिखाते हैं औकात, बताते हैं गलतियाँ उनके जीवन की। और तब... लगता है उन्हें.. जैसे यह पिछले जनम का कुछ चक्कर तो जरूर है.. पर.. यही तो शाश्वत सत्य है, औलाद तो हमेशा से ऐसी ही रही है भाई, जिसने मरने के बाद भी नहीं छोड़ा.. उनकी मि...

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